पर्यावरण प्रबंधन प्रभाग

1989 में स्थापित, पर्यावरण प्रबंधन प्रभाग (ईएमडी), आईएसओ 9001 के मानक वाली एक निगमित इकाई है l यह इकाई पर्यावरण संरक्षण और संसाधन की बेहतरी के लिए निम्नलिखित विविध गतिविधियों को शामिल करते हुए संयंत्रों, खदानों और इकाईयों के प्रयासों के एकत्रीकरण के लिए केंद्रीय भूमिका निभाती है:

  • सेल इकाईयों और नियामक अभिकर्ताओं के बीच एक सक्रिय अंतरापृष्ठ,

  • निगरानी और मूल्यांकन,

  • प्रौद्योगिकी प्रसार,

  • जागरूकता अभियान और कौशल उन्नयनl

इनके अतिरिक्त, संयंत्रों, खदानों और इकाईयों के निरंतर सहयोग से ईएमडी विभिन्न कार्यशालाओं और इकाईयों सहित सेल के मालगोदामों में आईएसओ 14001 से जुड़े पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस) के प्रचार के लिए प्रयत्नशील रहा है l

ईएमडी की प्रमुख गतिविधियाँ

पर्यावरण प्रबंधन

सेल संयंत्र और खदान, पारिस्थितिक संतुलन को नुकसान पहुचाए बिना अधिसूचित पर्यावरण मानकों के अनुरूप और विभिन्न तरह के कचरे के पर्यावरण-सापेक्ष प्रबंधन से संबंधित नियम के अनुसार, संयंत्र परिसर के अंदर और नगरों में, अपनी प्रक्रियाएं संचालित करते हैं। सेल ने निगमित पर्यावरण नीति (कॉर्पोरेट एनवायरनमेंट पालिसी) के अनुरूप अपने पर्यावरण सम्बन्धी दृष्टिकोण को भी विकसित किया है जो ना केवल अनुपालन की आवश्यकता को सम्बोधित करता है बल्कि इससे आगे जाने के प्रयासों पर भी जोर डालता है l इसके अतिरिक्त, सेल अपने सभी हितधारकों की चिंताओं का समाधान करने और उनमें पर्यावरण सम्बंधित अपने दृष्टीकोण का प्रसार करने के लिए प्रतिबद्ध है l

शुरुआत से ही, सेल के संयंत्र और खदान अनवरत रूप से इस दिशा में कठोर प्रयास कर रहे हैं ताकि विभिन्न संचालनों का निष्पादन पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से हो सके l इसके परिणामस्वरूप, पर्यावरणीय उत्सर्जन और बहावों के स्तर में कमी आई है, ठोस अपशिष्ट के उपयोग और हरियाली के विकास में वृद्धि हुई है l सेल के संयंत्र और खदान प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों/सुविधाओं का कुशलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं और पुनर्निर्माण एवं नवीनीकरण के माध्यम से नियमित रूप से इनका अनुरक्षण किया जा रहा है और आवश्यकता अनुसार उनमें सुधार भी लाया जा रहा है, ताकि दिन प्रतिदिन कठोर हो रहे पर्यावरणीय मानकों का अनुपालन हो सकेl

सम्मिलित प्रयासों से, पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) एमिशन लोड में उत्तरोत्तर कमी आ रही है l इसके अतिरिक्त, विस्तार एवं आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के दौरान, नवीनतम प्रदूषण नियंत्रण सुविधाओं के साथ-साथ, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकीयों को कार्यान्वित किया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप, प्रदूषण स्तर और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भी कमी आई है l

इसी प्रकार से, इस्पात संयंत्रों और खदानों में विभिन्न कार्यशालाओं में स्थापित एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांटों (ईटीपी) का प्रभावशाली संचालन करके, स्थानीय जल पुनःसंचरण प्रणालियों का कायाकल्प करके और संशोधित अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण के माध्यम से, जल प्रदूषण के स्तर को कठोरतापूर्वक नियंत्रित किया जाता है l संयंत्रों एवं खदानों के विभिन्न संचालनों से निकलने वाले अपशिष्ट जल का संशोधन ईटीपी’यों में किया जाता है और सीमा में स्थित मुहानों के माध्यम से प्रवाह किया जाता है, जो सम्बंधित निर्धारित मानदंडों के अनुकूल होता हैl

2018-19 में निम्नलिखित प्रमुख पर्यावरण प्रदर्शन संकेतक (ईपीआई) में पिछले पांच वर्षों में किया गया सुधार नीचे दर्शाया गया है:

  • विशिष्ट पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जन भार लगभग 16% घटा

  • विशिष्ट कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 3% घटा

  • विशिष्ट पानी की खपत 6% से अधिक घटी

  • विशिष्ट प्रवाह लगभग 17% घटा2 विशिष्ट प्रवाह का भार लगभग 11% घटा

  • ब्लास्ट फर्नेस (बीएफ) स्लैग का उपयोग 9% से अधिक बढ़ा

स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और अत्याधुनिक प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों / सुविधाओं को अपनाना:

सेल द्वारा बड़े पैमाने पर विस्तार के साथ आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के दौरान अपनाई गई कुछ प्रमुख सर्वोत्तम उपलब्ध प्रौद्योगिकियाँ निम्नानुसार हैं:

  • बीएसपी, आरएसपी एवं आईएसपी में उच्चतर क्षमता वाले (ऊँचे) कोक ओवन बैटरियों की स्थापना जिसमें लैंड बेस्ड पुशिंग एमिशन कंट्रोल सिस्टम, कोक ड्राई कूलिंग प्लांट जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैl

  • आरएसपी एवं आईएसपी में सिंटर संयत्रों में उन्नत इग्निशन प्रणाली (मल्टी-स्लिट बर्नर्स), सिंटर कूलर वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम जैसी सुविधाओं का प्रावधान l

  • बीएसपी, आरएसपी एवं आईएसपी में उच्चतर क्षमता वाले ब्लास्ट फर्नेसों की स्थापना जिसमें टॉप गैस प्रेशर रिकवरी टरबाइन, वेस्ट हीट रिकवरी, कोल् डस्ट इंजेक्शन, कास्ट हाउस डी-डस्टिंग, कास्ट हाउस स्लैग ग्रनुलेशन और टारपीडो लैडल जैसी प्रणालियाँ उपलब्धl

  • सम्पूर्ण सेल संयंत्रों में ऊर्जा की प्रखर खपत वाले इंगोट रूट को चरणबद्ध तरीके से हटानाl

  • सभी संयंत्रों में ऊर्जा खपत और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने हेतु रोलिंग मिल्स में पुशर टाइप रीहीटिंग फर्नेसों के स्थान पर वॉकिंग बीम रीहीटिंग फर्नेसों की स्थापनाl

 

जल संरक्षण – बेहतर कल की ओर एक अनवरत अभियान

कई वर्षों से संयंत्र संचालन के लिए पानी की खपत में कमी लाने के लिए विभिन्न पहल की गई हैं और इसे लागू किया गया है। हालाँकि, इस अमूल्य संसाधन के अधिक संरक्षण हेतु, सेल के संयंत्रों एवं नगरों और आसपास के समाज में जल संरक्षण एक प्राथमिकता बन गई हैl यह उत्कृष्ट प्रयास निरंतर आधार पर जारी है

 

इसके अतिरिकत, जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) को प्राप्त करने के लिए परिष्करण और पुनर्चक्रण की सुविधाओं के कार्यान्वयन के लिए विभिन्न संयंत्रों पर समुचित कदम पहले से ही उठाए गए हैं। बीएसपी और बीएसएल में तीन प्रवाह निकास में से, प्रत्येक संयंत्र में एक प्रवाह निकास से अपशिष्ट के परिष्करण और पुनर्चक्रण की सुविधा पहले ही विकसित की जा चुकी है। जो कि परिचालित है। शेष प्रवाह निकासों के लिए कार्य प्रगति पर है। संयंत्रों में जेडएलडी योजनाएं कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं।

 

जल संरक्षण के लिए अपनाई गई कुछ अन्य उल्लेखनीय पहल नीचे दी गई हैं:

  • जागरूकता अभियान

  • स्थानीयकृत पुन: परिसंचरण प्रणाली में सुधार

  • थर्ड पार्टी द्वारा पानी का ऑडिटिंग (लेखापरीक्षण)

  • संयंत्र की विभिन्न इकाईयों और प्रवाह निकास से निकलने वाले प्रवाह की गुणवत्ता और मात्रा की ऑनलाइन निगरानी

  • वर्षा जल संचयन योजना

  • MODEX (एमओडीईएक्स) के तहत आगामी इकाइयों में बेहतर उपचार (प्रशोधन) प्रणाली

अपशिष्ट का प्रभावी प्रबंधन

औद्योगिक अपशिष्ट

उद्योग की स्थिरता में सुधार करने के लिए 4R (कटौती, पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और पुनर्प्राप्ति) के सिद्धांत को कई तरीकों से लागू किया जाता है। शून्य अपशिष्ट की अवधारणा इस्पात क्षेत्र के लिए लगातार प्रासांगिक होती जा रही है।

औद्यौगिक स्तर पर ठोस अपशिष्ट, बीएफ फ्ल्यू डस्ट, बीएफ स्लैग और अपशिष्ट रिफैक्ट्री ब्रिक्स का पूरी तरह से उपयोग किया जाता है। बीएफ स्लैग को क्लिंकर के विकल्प के रूप में सीमेंट उद्योगों में उपयोग के लिए कास्ट हाउस स्लैग ग्रेनुलेशन संयंत्र के माध्यम से दानेदार बनाया जाता है। सेल ने 2018-19 के दौरान बीएफ स्लैग का 96% और बीओएफ स्लैग का लगभग 56% उपयोग किया है।

संयंत्र की सीमा के भीतर उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से, निम्नलिखित अनुसंधान एवं विकास आधारित पहल हाल ही में की गई हैं:

  • दक्षिण पूर्व रेलवे (एसईआर) के साथ, इस्पात नगर यार्ड, बोकारो में, "रेल ट्रैक गिट्टी के रूप में अपक्षीण बीओएफ स्लैग के उपयोग" के लिए फील्ड परीक्षण

  • "बीओएफ स्लैग की स्टीम परिपक्वता" पर पायलट स्तर पर अध्ययन

  • सीमेंट बनाने में फ़ीड सामग्री के रूप में बीओएफ स्लैग के उपयोग के लिए अध्ययन

  • मृदा की गुणवत्ता में सुधार के लिए बीओएफ स्लैग के उपयोग पर अध्ययन

  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए इस्पात स्लैग का समुच्चय के रूप में उपयोग की अनुकूलता पर अध्ययन

नगर निगम का अपशिष्ट

"सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016" के अनुसार नगरपालिका के कचरे, जो नगरों में घरों से निकलते हैं को स्रोत पर अलग करने और प्रबंधन की आवश्यकता होती है।

संयंत्र परिसर में कैंटीन से उत्पन्न होने वाले जैव-अपघटनीय अपशिष्ट से निपटने के लिए 400 किग्रा प्रति दिन क्षमता वाले जैव-पाचक की स्थापना, डीएसपी और आरएसपी में की गई है।

अपशिष्ट प्लास्टिक से सड़क बनाना

आरएसपी ने हाल ही में सड़क निर्माण के लिए हॉट मिक्स संयंत्र के जरिए प्लास्टिक कचरे के उपयोग के लिए एक हरित पहल की है l एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में, एक किलोमीटर सड़क का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है l आरएसपी की अन्य सड़कों एवं बाकी संयंत्रों में, सड़कों के निर्माण में प्लास्टिक कचरे का उपयोग करने हेतु योजना बनाई जा रही हैl

पॉली क्लोरीनेटेड बाय फिनाइल्स (पीसीबी) का पर्यावरण के अनुकूल निस्तारण:

पॉली क्लोरीनेटेड बाय फिनाइल्स (पीसीबी), जो कि अत्यधिक विषाक्त पर्यावरणीय प्रदूषक होते है, कृत्रिम जैविक रसायन की श्रेणी में आते हैं और इनका उपयोग कई उद्योगों में किया जाता है l इन रसायनों के प्रबंधन के लिए स्टॉकहोम सम्मलेन नामक एक अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के अंतर्गत इन रसायनों को परसिस्टेंट आर्गेनिक पोलुटेंट्स (पीओपी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है l पॉली क्लोरीनेटेड बाय फिनाइल्स के नियमन अधिसूचना अप्रैल, 2016 में जारी की हैl अधिसूचना के अनुसार, किसी भी स्वरुप में पीसीबी का उपयोग 31 दिसम्बर, 2025 तक पूरी तरह से निषिद्ध किया जायेगा l

देश में संचित पीसीबी के प्रबंधन एवं निस्तारण करने हेतु एक अत्याधुनिक सुविधा को विकसित करने के लिए और इस विषय में देश की आवश्यकता को समझते हुए, बीएसपी ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार) और यूनाइटेड नेशंस इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन (यूनिडो) की साझेदारी में संयंत्र स्थल पर एक पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण सुविधा को स्थापित करने के लिए एक परियोजना की पहल की है l परियोजना को यूनिडो के माध्यम से ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी (जीईएफ) द्वारा आंशिक रूप से अनुदान दिया गया है l सेल, आधारिक संरचनाएँ जैसे कि भूमि का प्रावधान, निर्माण, नागरिक कार्य, जनोपयोगी सुविधाओं और श्रमिक आदि के द्वारा परियोजना को सह-वित्त प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है l

कार्बन सिंक का निर्माण

 

पेड़-पौधे पारिस्थितिकी प्रणालियों और कार्यों को संतुलित करने में और कार्बन सिंक के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं l पेड़-पौधों के विराट योगदान को ध्यान में रखते हुए, सेल ने लम्बे समय से, शुरुआती अवस्था से ही संयंत्रों और खदानों में निरंतर व्यापक रूप से वनीकरण कार्यक्रम को अपनाया है l

पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं में से एक यह भी है कि 2030 तक CO2 का 2.5 से 3 बिलियन टन तक के ‘कार्बन सिंक’ का निर्माण अतिरिक्त वन और पेड़ों के माध्यम से करना है। भारत सरकार की एनडीसी प्रतिबद्धता के अनुरूप, सेल ने अपने विजन डॉक्यूमेंट में प्रत्येक वर्ष पांच लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है।

सेल में स्थापना के बाद से अब तक, 205.97 लाख पौधे लगाए गए हैं। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान सेल के संयंत्रों और इकाइयों में लगभग 4.43 लाख पौधे लगाए गए हैं।

वनीकरण के माध्यम से कार्बन-डाई-ऑक्साइड का बायोसिक्वेस्ट्रेशन

कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने और उत्पादित कार्बन को प्रणाली में फिर से लौटा देने के उद्देश्य हेतु, सेल अपने कार्बन फुटप्रिंट का मूल्यांकन कर रहा है और साथ ही साथ अपने वर्तमान जैविक संसाधनों के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड के अधिग्रहण के सामर्थ्य का भी मूल्यांकन कर रहा है l वनीकरण के माध्यम से कार्बन अधिग्रहण पर राउरकेला इस्पात संयंत्र में एक परियोजना का आरंभ किया गया है l इस परियोजना के लिए मैसर्स. ट्रॉपिकल फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट, जबलपुर के साथ सेल का अनुबंध है l

गैर-पारंपरिक ऊर्जा का संवर्धन

सेल ने अक्षय ऊर्जा के अनुप्रयोग को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित परियोजनाओं को पहले ही लागू कर दिया है:

  • आरएसपी में ग्रिड से जुड़ा 1 मेगावाट सौर ऊर्जा संयंत्र

  • विभिन्न संयंत्रों और इकाइयों की छत्त पर में 3 मेगावाट सौर ऊर्जा इकाईयॉं

इसके अलावा, सेल निम्नलिखित योजनाओं के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में है:

  • मंदीरा बांध पर 10 मेगावाट का हाइडल पावर प्लांट लगाने के लिए आरएसपी और ग्रीन एनर्जी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ओडिशा लिमिटेड (जीईडीसीओएल) के बीच एक संयुक्त उद्यम (ज्वाइंट वेंचर) समझौता हुआ है।

  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) की योजना के तहत विभिन्न सेल भवनों पर 6.195 मेगावाट की छत वाली सौर इकाइयाँ

  • विभिन्न स्थानों पर 242 मेगावाट की कुल क्षमता के भूमि आधारित सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना

इसके अलावा, सेल भारत सरकार की पहल "सभी के लिए उन्नत ज्योति, सभी के लिये सुगम एलईडी (उजाला) योजना के द्वारा परंपरागत प्रकाश व्यवस्था से परिवर्तित होकर धीरे-धीरे अधिक ऊर्जा-कुशल और टिकाऊ एलईडी प्रकाश व्यवस्था की ओर बढ रहा है। पिछले चार वर्षों में 53,500 से अधिक एलईडी लाइटें लगाई गईं, और भविष्य में तैयार होने वाली इमारतों और परियोजनाओं को कुशल-ऊर्जा प्रकाश व्यवस्था से सुसज्जित किया जाएगा।

सतत विकास परियोजनाएं

जैव-विविधता को बनाये रखने एवं उसमें वृद्धि लाने और पारिस्थितिकी प्रणालियों की सेवाओं को फिर से बहाल करने के लिए विकृत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित करना और उन्हें फिर से बहाल करना आवश्यक है l

पिछले कुछ वर्षों में, ओडिशा में स्थित पूर्णापानी लाइमस्टोन एंड डोलोमाइट खदान में लगभग 250 एकड़ विकृत खदान क्षेत्र में विभिन्न प्रजतियों के देशी पौधों और औषधीय पौधे लगाकर जैविक रूप से समृद्ध जंगल को बहाल करने का कार्य किया गया है। 200 एकड़ खान रिक्त क्षेत्र भी जैविक रूप से स्वच्छ उत्पादक जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में बदल गया है, जो स्थानीय समुदाय के लिए जल निकाय में वैकल्पिक आजीविका के रूप में मछली पकड़ने की सुविधा प्रदान करता है।

इस योजना को दिल्ली विश्वविद्ध्यालय के द्वारा, भरत सरकार के जैव-प्रोद्योगिकी विभाग के सहयोग से सफलतापूर्वक पूरा किया गया है और इसका रख-रखाव अभी भी जारी है।

पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस) का कार्यान्वयन

आईएसओ: 14001 से जुड़ी पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस) संगठन के उत्पादों, सेवाओं और प्रक्रियाओं के तत्काल और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन करने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा है। ईएमएस के कार्यान्वयन ने सेल और इकाइयों को अपने प्रदर्शन को हमेशा उपयुक्त नियामक आवश्यकताओं के भीतर सुनिश्चित करने में मदद की है। सेल के सभी एकीकृत इस्पात संयंत्र, प्रमुख इकाइयाँ और गोदाम, ईएमएस आईएसओ: 14001 मानक के अनुरूप हैं।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दों का शमन

जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दा है। सेल, एक कॉर्पोरेट इकाई होने के नाते भारत में सहक्रियात्मक एक्शन के मुद्दों और अवसरों को सम्बोधित करने के लिए प्रयासरत है तांकि औसत वैश्विक तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के परिणाम सीमित हो सकें। क्योटो प्रोटोकॉल (दिसंबर, 1997) के अनुरूप एवं स्वच्छ विकास और जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना में कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने पर विशेष जोर दिया गया है।

पेरिस समझौता, जो 4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ, 2020 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन शमन, अनुकूलन और वित्त के लिए एक समझौता है। सदस्यों / राष्ट्रों को राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) करने के साथ प्रस्तुतिकरण, संवाद और अनुरक्षित करने की आवश्यकता है। भारत 2005 के स्तर से अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 2030 तक 33-35% कम करना चाहता है।

एनडीसी के साथ सहमति में, सेल ने 2030 तक 2.30 टन / टीसीएस के विशिष्ट कार्बन-डाई-ऑक्साइड उत्सर्जन को निर्धारित करने का लक्ष्य रखा है।

एक जिम्मेदार कॉरपोरेट के रूप में, सेल स्वच्छ स्टील बनाने के लिए हमेशा अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए प्रयासरत रहा है। ऊर्जा-कुशलता और ग्रीनहाउस गैस के शमन की प्रणालियों के साथ अत्याधुनिक उत्पादन तकनीकों को अपनाना, उच्च स्तर की तकनीकी अनुशासन और अच्छी तरह से रखी गई पर्यावरणीय नीतियां और प्रभावी कॉर्पोरेट प्रशासन न केवल हमारे विविध हितधारकों के लिए मूल्य में वृद्धि करते हैं, बल्कि स्थायी पर्यावरण के प्रवर्तक के रूप में हमारी प्रतिबद्धताओं की पुष्टि भी करते हैं।

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